19. प्रबंधन में समन्वय
परिभाषा,
उद्देश्य, सिद्धांत, अवरोध
तथा तकनीकें
किसी भी संगठन में केवल योजना बनाना और निर्देश जारी करना
ही उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए पर्याप्त नहीं होता। वास्तविक प्रभावशीलता तब
प्राप्त होती है जब संगठन के सभी भाग—लोग, प्रक्रियाएँ और विभाग—एक समान लक्ष्य की ओर सामंजस्यपूर्ण
ढंग से कार्य करें। प्रयासों और संसाधनों का यह एकीकरण प्रबंधन की एक मौलिक क्रिया
है, जिसे समन्वय कहा जाता है।
समन्वय एक संगठन के विभिन्न व्यक्तियों और इकाइयों की गतिविधियों तथा योगदानों को इस प्रकार मिलाने का सचेत प्रयास है कि वे सामूहिक रूप से संगठनात्मक उद्देश्यों में योगदान करें। यह सुनिश्चित करता है कि कार्य अलग-थलग न होकर, एकीकृत, उद्देश्यपूर्ण और प्रभावी हों। यदि समन्वय न हो, तो सबसे अच्छी योजनाएँ भी वांछित परिणाम देने में असफल हो सकती हैं।
समन्वय का अर्थ और परिभाषाएँ
समन्वय वह कला और विज्ञान है जो यह सुनिश्चित करता है कि
संगठन के विभिन्न घटक एकीकृत और सहयोगात्मक ढंग से कार्य करें। विभिन्न प्रबंधन
विचारकों ने इसकी परिभाषा निम्नलिखित रूप से दी है—
- हेनरी
फेयोल ने समन्वय को ऐसा तंत्र माना जो व्यक्तियों के प्रयासों में सामंजस्य
स्थापित कर संगठन को सामूहिक लक्ष्यों तक पहुँचने में सक्षम बनाता है।
- कून्ट्ज़
और ओ’डॉनेल के अनुसार, समन्वय समूह प्रयासों की सुव्यवस्थित व्यवस्था
और समकालिकता है, जो एक समान लक्ष्य की प्राप्ति हेतु कार्यों में एकता लाती है।
- मुनी और
रेली ने समन्वय को “प्रबंधन का सार” कहा और इसे वह सूत्र माना जो संगठनात्मक
संरचना को गतिशील और कार्यक्षम बनाए रखता है।
इन दृष्टिकोणों से स्पष्ट है कि समन्वय एक बार की क्रिया
नहीं है, बल्कि
यह एक सतत प्रक्रिया है, जो
सभी प्रबंधकीय कार्यों को जोड़ती है।
समन्वय के उद्देश्य
प्रबंधन में समन्वय के प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार हैं—
1. प्रयासों का एकीकरण
– व्यक्तिगत एवं विभागीय
प्रयासों को एकजुट कर साझा लक्ष्यों की ओर ले जाना।
2. संसाधनों का सर्वोत्तम
उपयोग – कार्य
की पुनरावृत्ति रोकना तथा मानव, वित्तीय और भौतिक संसाधनों का दक्षतापूर्वक प्रयोग करना।
3. टीम भावना और सहयोग को
बढ़ावा देना – विभागों
और कर्मचारियों में सहयोग तथा आपसी समझ विकसित करना।
4. निर्णय-निर्माण में
स्थिरता – विभिन्न
स्तरों पर लिए गए निर्णयों को परस्पर सामंजस्यपूर्ण बनाना।
5. संगठनात्मक प्रदर्शन में
सुधार – कार्यप्रवाह
को सुचारू बनाना और समय पर उद्देश्यों की प्राप्ति करना।
6. स्थिरता और संतुष्टि
– ऐसा कार्य वातावरण बनाना
जिसमें कर्मचारी संतुष्ट, प्रेरित और संगठन की सफलता के प्रति समर्पित हों।
समन्वय की आवश्यकता
संगठनात्मक कार्यों की जटिलता और परस्पर निर्भरता के कारण
समन्वय आवश्यक हो जाता है। इसके महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है—
- संघर्ष
की रोकथाम हेतु – अलग-अलग विभाग यदि स्वतंत्र रूप से काम करें तो
गलतफहमियाँ और विवाद उत्पन्न हो सकते हैं। समन्वय इन समस्याओं को रोकता है।
- संगति
बनाए रखने हेतु – बड़े संगठनों में विभिन्न इकाइयों के अलग
लक्ष्य हो सकते हैं। समन्वय उन्हें मुख्य मिशन से जोड़ता है।
- उत्पादन
अधिकतम करने हेतु – प्रयासों को एकीकृत कर और पुनरावृत्तियों को
हटाकर प्रभावशीलता एवं उत्पादकता बढ़ाता है।
- विशेषज्ञता
को सुचारू करने हेतु – विभिन्न विशेषज्ञों और विभागों को सहयोगात्मक
ढंग से कार्य करने में सक्षम बनाता है।
- संगठनात्मक
लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु – यह सभी गतिविधियों को एक समान उद्देश्य की ओर
निर्देशित करता है।
समन्वय की कमी के परिणाम
यदि संगठन में समन्वय नहीं होता या यह अप्रभावी होता है,
तो निम्न समस्याएँ उत्पन्न
होती हैं—
- कार्यप्रवाह
में बाधा – भ्रम और कार्य की पुनरावृत्ति से कार्य रुक
सकता है।
- संसाधनों
का अक्षम उपयोग – बिना स्पष्ट दिशा के संसाधन व्यर्थ हो सकते
हैं।
- कर्मचारियों
की निराशा – भूमिकाओं की अस्पष्टता और संचार की कमी से
असंतोष और उत्साहहीनता आती है।
- संगठनात्मक
संघर्ष – विभाग असफलताओं के लिए एक-दूसरे को दोष देने लगते हैं।
- संगठनात्मक
प्रदर्शन में गिरावट – समन्वय की अनुपस्थिति से अक्षम्यता, विलंब
और उत्पादन में कमी आती है।
प्रभावी समन्वय में बाधाएँ
निम्न कारक संगठन में समन्वय को बाधित करते हैं—
1. संगठनात्मक जटिलता
– संगठन के बड़े होने पर विभिन्न
इकाइयों के बीच समन्वय कठिन हो जाता है।
2. अहंकार और स्वार्थ
– जब व्यक्ति या विभाग अपने
हितों को संगठन से ऊपर रखते हैं।
3. राजनीतिक हस्तक्षेप
– बाहरी हस्तक्षेप आदेश की
शृंखला को तोड़ सकता है और प्रबंधकीय अधिकार को कमजोर करता है।
4. संचार की कमी
– सूचना के अभाव में गलतफहमियाँ
और असंगत कार्य उत्पन्न होते हैं।
5. भूमिकाओं की अस्पष्टता
– उत्तरदायित्व स्पष्ट न होने पर
कार्य या तो दोहराए जाते हैं या उपेक्षित रह जाते हैं।
6. अक्षम नेतृत्व
– अनुभवहीन या अयोग्य व्यक्तियों
को जिम्मेदार पद सौंपने से समन्वय बाधित होता है।
समन्वय के सिद्धांत
प्रभावी समन्वय कुछ सिद्धांतों पर आधारित होता है—
1. प्रत्यक्ष संपर्क
– प्रबंधक को अधीनस्थों और
सहयोगियों से सीधे संवाद करना चाहिए।
2. शीघ्र आरंभ
– समन्वय को योजना निर्माण के
चरण से ही प्रारंभ करना चाहिए।
3. पारस्परिक संबंध
– संगठन की सभी गतिविधियाँ
परस्पर जुड़ी होती हैं।
4. समयबद्धता
– समन्वित कार्य समय पर होने
चाहिए ताकि उनका प्रभाव बना रहे।
5. प्रभावी संचार
– खुला और पारदर्शी संवाद आवश्यक
है।
6. सतत प्रक्रिया
– समन्वय को प्रबंधन के सभी
चरणों में निरंतर बनाए रखना चाहिए।
समन्वय सुनिश्चित करने की तकनीकें
संगठन समन्वय को स्थापित करने के लिए विभिन्न उपाय अपना
सकते हैं—
- स्पष्ट
उद्देश्य निर्धारण – सभी विभागों के लिए एकीकृत और स्पष्ट लक्ष्य तय
करना।
- उपयुक्त
संगठनात्मक संरचना – ऐसी संरचना बनाना जो संवाद, उत्तरदायित्व
और सामंजस्य को समर्थन दे।
- मानकीकृत
नीतियाँ और प्रक्रियाएँ – सभी विभागों में कार्य के लिए समान नियम लागू
करना।
- द्विपक्षीय
संचार – प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच खुला संवाद सुनिश्चित करना।
- नियमित
समूह बैठकें – प्रगति की समीक्षा और जानकारी साझा करने हेतु
बैठकें आयोजित करना।
- प्रत्यक्ष
संवाद माध्यम – संबंधित इकाइयों के बीच सीधे संपर्क की अनुमति
देना।
- समन्वय
समिति का गठन – अंतर-विभागीय समन्वय हेतु विशेष समितियाँ
बनाना।
निष्कर्ष (Conclusion)
समन्वय प्रभावी प्रबंधन की रीढ़ है। यह योजना,
संगठन,
निर्देशन और नियंत्रण सभी
कार्यों को एकीकृत कर उन्हें एक सुसंगत और संगठित रूप प्रदान करता है। बिना समन्वय
के श्रेष्ठ योजनाएँ और कुशल कर्मचारी भी परिणाम देने में असफल हो सकते हैं।
एक कुशल प्रबंधक केवल योजनाकार या निर्णयकर्ता नहीं होता,
बल्कि वह एक समन्वयक होता है,
जो संगठन के विविध तत्वों को
एकजुट कर उन्हें एक इकाई की तरह कार्य करने में सक्षम बनाता है। जिस प्रकार संगीत
के स्वरों का सामंजस्य मधुरता उत्पन्न करता है, उसी प्रकार संगठनात्मक प्रयासों का सामंजस्य दक्षता,
प्रगति और सफलता लाता है।
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